'दिल्ली 6'


प्रस्‍तुत . किशोर कुमार साहू, डीईओ संस्‍क़ति
रायपुर

छत्तीसगढ़ी लोक अस्मिता और उसकी पहचान को लेकर जितने सवाल और विचार 'दिल्ली 6' के इस गीत सिलसिले में उठे, उनमें स्मृति की गहराई तो थी, व्यापक संदर्भों की चर्चा भी हुई लेकिन पूरा मामले में उल्लेख का इकहरापन ही नजर आया, यानि ज्यादातर हवाले और संदर्भ खुद को जोड़कर देखे जाते रहे। इस पूरे दौर में नये पुराने-नाम आते रहे, लेकिन वह नदारद रहा, जो अधिक जरूरी था, वह यह कि इस बहाने हम शोध का गंभीर नजरिया अपनाते हुए, अपने लोकगीतों की परम्परा में उनकी याद दुहराते, जो इस और इस तरह के अन्य गीतों के माध्यम से छत्तीसगढ़ी लोक सुर संसार के संवाहक रहे।

दिल्ली 6 के गीत 'सास गारी देवै' की बात की जाए तो इस संदर्भ में हबीब तनवीर को तो याद किया ही जाएगा, लेकिन पूरे महत्व के साथ भुलवाराम यादव, बृजलाल लेंझवार, लालूराम और बरसन बाई, चम्पा जैसे नामों का बार-बार उल्लेख जरूरी है। इन दोनों समूहों की अलग-अलग जानकारी मिल रही है, जिनके स्वर में यह गीत रिकार्ड हुआ है, तो यह वक्त है, इस गीत और उसके गायकों के बहाने अपनी परम्परा को खंगालने-टटोलने का।

ददरिया गीत की यह पारंपरिक कृति, लोक की थाती है। ददरिया में सवाल-जवाब किस्म की आशु तुकबंदियां होती है, और इसलिए गायक के साथ जोड़-घटाव और परिवर्तन आसानी से संभव होता है और परम्परा में यह हर गाने वाले के साथ अपना हो जाता है। ददरिया, श्रम-श्रृंगार गीत कहा जा सकता है, जिसका श्रम 'मैन पावर' का 'लेबर' नहीं, बल्कि जीवन में समाहित सुर-ताल है। ऐसा श्रम, जिसका पसीना सौंदर्य का रस है।

इस ददरिया गीत 'सास गारी देवै' का एक सिलसिला हबीब तनवीर तक पहुंचा और कोई 40 साल पहले रिकार्ड बनकर आकाशवाणी से गूंजता रहा और दूसरा रघुवीर यादव से होकर ए आर रहमान तक गया, भूले जा चुके से इस गीत की प्रासंगिकता फिर से बनी। जब निजता और मौलिकता की सीमा लांघते हुए इस गीत को अलग पहचान मिली है तो यह मौका, अपनी इकहरी होती याद को संदर्भ के साथ व्यापक करने का, आत्म सम्मान को परम्परा के सम्मान में समाहित करने का और लोक-संगीत में जीवन का लय पाकर संकीर्ण स्व से निकलकर अपनी समष्टि की ओर दृष्टिपात का है, जो लोक-परम्परा बनकर संस्कृति को संबल देता है।

आलेख
राहुल सिंह, छत्तीसगढ़
मो.- +919425227484